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भारत
में प्रचीन काल से सभ्यता के विकास के प्रमाण मौजूद है
सांस्कृतिक उत्तरजीविका की विध्मतता हमारी संस्कृति
के विकास का प्रमाण है साथ ही इस बात का प्रमाण है कि
हमारे पूर्वजों ने संरक्षण की कल्पना मात्र ही नही की
बल्कि उसके बचाव के उपाय भी दिये कुछ समय बाद संरक्षण
को बिल्कुल ही भुला दिया गया। प्रारम्भ में संरक्षण एवं
पुर्नभंडारण मुख्यत: कलाकारों की जिम्मेदारी थी। जो
बिना उसके दीर्घकालिक प्रभाव को जाने उसका प्रयोग कर
रहे थे।
जैसा
कि हमें ज्ञात है सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण एक
शीघ्रता से विकसित होने वाला क्षेत्र है और अब भली
प्रकार विकसित हो गया है संरक्षण का अर्थ मात्र कला
वस्तुओं का बचाव की नही अपितु इसमें वैज्ञानिक जांच
परख और कला में प्रयोग तकनीकि का अध्ययन भी शामिल है।
यह अनेक पहलुओं पर प्रकाश डालता है।
उदाहरणत:
1.
भण्डारण एवं प्रदर्शन के सही विधि का चुनाव
2. विकृति प्रक्रिया की क्रियाविधि का अध्ययन।
3. उदगम, वास्तुविकता एवं डेटिंग का निश्चय।
4. प्राचीन सांस्कृतिक संबंधों एवं व्यापार की स्थापना
इत्यादि।
कुछ
प्रादेशिक अजायबघर एवं उनके संरक्षण प्रयोगशालायें खोलीं
गई हैं उदाहरणत: भारतीय अजायबघर एवं प्रयोगशाला,
मद्रास सरकार अजायबघर एवं प्रयोगशाला वास्तविक संरक्षण
के साथ विकासकार्यो के उपाय एवं तकनीकि का विकास कार्य
भी किया गया। ऐसा कहा जाता है कि क्षयकारी कांसा के
विकास के लिए मद्रास सरकार म्युजियम ने चपल रासायनिक
विधि का प्रयोग किया।
NRLC को 1976 में सांस्क्रतिक विभाग के सह-कार्यालय के
रूप में स्थापित किया गया। जो कि 1987 में भारत सरकार
का वैज्ञानिक उपक्रम था। NRLC का ध्येय विभन्न
संग्रहालयों, संस्थानों को संरक्षण का महत्व समझना एवं
इस क्षेत्र में सहयता प्रदान करना है। उददेश्य पूर्ति
के लिए NRLC निम्न कदम उठाता है।
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